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Volume 4 Issue 2
March-April 2026
| Author(s) | डाॅ. श्यामता साहू |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | समकालीन काव्य में जनतंत्र का प्रभावी चित्रण हुआ है। जिन समकालीन कवियों ने युगानुरूप अपने काव्य में लोकतंत्र का अंकन किया है उनमें अज्ञेय,मुक्तिबोध, शमषेर, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, केदारनाथ सिंह, नरेष मेहता, दुष्यंतकुमार, धूमिल, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, लीलाधर जगूड़ी, कुमार विकल, बलदेव बंषी, विष्वनाथ त्रिपाठी, गोरख पाण्डेय, चन्द्रकांत देवताले, उदयप्रकाष, अरूणकमल, मंगलेष डबराल, रामकुमार कृषक, राजेष जोषी, वेणु गोपाल, नचिकेता, रामदेव आचार्य, विनोद गोदरे, ज्ञानेन्द्रपति, सोमदत्त, सुरेन्द्र तिवारी, राजकुमार कुंभज, ललित शुक्ल ,नरेन्द्र मोहन, मालती शर्मा, शान्ति सुमन, सावित्री डागा, दिनेष नंदिनी, हरि ठाकुर, असद जैदी, कैलाष वाजपेयी, के. अतिरिक्त अरूण आदित्य, मदन कष्यप, एकान्त श्रीवास्तव, गीत चतुर्वेदी, निषिकान्त, श्रीकान्त जोषी, दिनकर सोनवलकर, कुन्तलकुमार जैन, मदन डागा, मनोज सोनकर के नाम विषेष उल्लेखनीय हैं। साहित्य जीपन की सार्थक प्रस्तुति है। भारत की शक्ति उसकी मानसिक शक्ति है। गांवों का सामूहिक जीवन स्वायत्त शासन और लोकतंत्र की अवधारणायें, अहिंसा, सत्य, अध्यात्म आदि भारत की वे थातियां है। जिन्हें संभालने ,संवारने और व्यवहार्य बनाये रखने की जिम्मेदारी रचनाकर्म पर है। कविन्द्र रविन्द्र को महात्मा गांधी ने एक पत्र लिखकर अपनी भावनाओं से अवगत कराया था कवि हमारे वैयक्त्कि चक्षुओं के सामने संुदर चिड़ियों के सुंदर चित्र खींचता है, जो उषा के आगमन पर महिमा के गीत गाती हुई शून्य में अपने रंगीन, पंखों से उड़ान भरती है। मुझे ऐसे पक्षियों को देखने में वेदना ही हुई, जो निर्बलता के कारण पंख फड़फड़ाने की चाहत ही नहीं कर पाते। |
| Keywords | |
| Discipline | Other |
| Published In | Volume 4, Issue 2, March-April 2026 |
| Published On | 2026-04-17 |

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