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Volume 4 Issue 3
May-June 2026
| Author(s) | डाॅ. रोमा कुमारी |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा मुख्य रूप से समावेशी और धर्मनिरपेक्ष है, जो विविधता में एकता पर आधारित है। यह यूरोपीय जातीय राष्ट्रवाद से भिन्न, नागरिक राष्ट्रवाद का रूप है, जिसमें सभी नागरिकों को धर्म, भाषा, जाति या संस्कृति के बावजूद समान अधिकार प्राप्त हैं। स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं ने अहिंसा, समानता और धार्मिक सहिष्णुता को राष्ट्रवाद का आधार बनाया, जिससे ब्रिटिश ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति का मुकाबला किया गया। लोकतंत्र में एकीकरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत की बहुलतावादी समाज में भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को एकीकृत कर ही मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था संभव है। संविधान में निहित ‘सर्व धर्म समभाव‘ और ‘एकता में विविधता‘ के सिद्धांत अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाते हैं। स्वतंत्रता के बाद रियासतों का एकीकरण और भाषाई राज्यों का गठन इसकी मिसाल है। हालांकि, हाल के वर्षों में धार्मिक राष्ट्रवाद के उदय से चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं, किंतु समावेशी राष्ट्रवाद ही भारतीय लोकतंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करता है। यह अवधारणा न केवल राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देती है, बल्कि वैश्विक स्तर पर बहुलतावादी लोकतंत्र का मॉडल प्रस्तुत करती है। |
| Keywords | राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकीकरण एवं बहुलतावाद आदि |
| Discipline | Other |
| Published In | Volume 4, Issue 3, May-June 2026 |
| Published On | 2026-05-17 |

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