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Volume 4 Issue 4
July-August 2026
| Author(s) | डॉ अशोक कुमार मीना |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | भारतीय लोकतंत्र की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक 'नीचे से लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण' और सामाजिक समूहों का राजनीतिक सशक्तीकरण रहा है। स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में भारतीय राजनीति में 'एक-दल प्रभुत्व प्रणाली' (कांग्रेस प्रणाली) का बोलबाला था, जिसमें समाज के उच्च वर्गों का वर्चस्व था। हालांकि, 1980 और 1990 के दशकों में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के अभ्युदय ने भारतीय लोकतांत्रिक परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया। इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि किस प्रकार क्षेत्रीय दलों ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) और अन्य हाशिए पर स्थित समुदायों को राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में लाने का कार्य किया है। यह अध्ययन मंडल आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन, बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवाद पार्टी (SP), राष्ट्रीय जनता दल (RJD), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) जैसे प्रमुख क्षेत्रीय दलों के केस अध्ययनों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की इस प्रक्रिया का मूल्यांकन करता है। निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि क्षेत्रीय दलों ने न केवल नीति-निर्माण में वंचित वर्गों के हितों को प्राथमिकता दिलाई है, बल्कि भारत की गठबंधन राजनीति (Coalition Politics) के माध्यम से केंद्र सरकार के गठन और उसकी प्राथमिकताओं को तय करने में निर्णायक भूमिका निभाई है। यद्यपि, परिवारवाद, आंतरिक विभाजन और पहचान की संकीर्ण राजनीति जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं, फिर भी क्षेत्रीय दलों ने भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी, प्रतिनिधिक और सहभागी बनाने में अद्वितीय योगदान दिया है। |
| Keywords | क्षेत्रीय दल, वंचित वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), बहुजन, राष्ट्रीय राजनीति, गठबंधन सरकार, सामाजिक न्याय, प्रतिनिधि लोकतंत्र। |
| Discipline | Arts |
| Published In | Volume 4, Issue 4, July-August 2026 |
| Published On | 2026-08-13 |

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