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Volume 4 Issue 3
May-June 2026
| Author(s) | चन्द्र कांत झा |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | भारत में ग्राम सभा स्थानीय स्वशासन की एक महत्वपूर्ण और आधारभूत संस्था है, जो लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक सशक्त बनाने का कार्य करती है। 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से ग्राम सभा को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई, जिससे ग्रामीण नागरिकों को प्रत्यक्ष लोकतंत्र में भागीदारी का अवसर मिला। ग्राम सभा में गांव के सभी पंजीकृत मतदाता सदस्य होते हैं, जो इसे एक व्यापक और समावेशी मंच बनाते हैं। यह संस्था न केवल विकास योजनाओं के निर्माण और अनुमोदन में भाग लेती है, बल्कि उनके क्रियान्वयन की निगरानी और मूल्यांकन भी करती है। ग्राम सभा की भूमिका विशेष रूप से जमीनी स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह ग्रामीण समुदाय की आवश्यकताओं, प्राथमिकताओं और समस्याओं को सीधे निर्णय प्रक्रिया में शामिल करती है, जिससे योजनाएं अधिक प्रासंगिक और प्रभावी बनती हैं। ग्राम सभा सामाजिक लेखा-जोखा के माध्यम से पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करती है तथा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण में भी सहायक होती है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों का चयन ग्राम सभा द्वारा किया जाता है, जिससे सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा मिलता है। ग्राम सभा की प्रभावशीलता कई चुनौतियों से प्रभावित होती है, जैसे जनभागीदारी की कमी, जागरूकता का अभाव, राजनीतिक हस्तक्षेप, तथा प्रशासनिक कमजोरियां। कई स्थानों पर ग्राम सभा की बैठकों का नियमित आयोजन नहीं होता, जिससे इसकी भूमिका सीमित हो जाती है। इसके बावजूद, यदि उचित जनजागरूकता, प्रशिक्षण और तकनीकी संसाधनों का उपयोग किया जाए, तो ग्राम सभा को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। ग्राम सभा भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम है, जो न केवल ग्रामीण विकास को गति देती है, बल्कि नागरिकों को सशक्त बनाकर एक सहभागी और उत्तरदायी शासन व्यवस्था की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। |
| Keywords | ग्राम सभा, पंचायती राज, विकेंद्रीकरण, जनभागीदारी, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय इत्यादि |
| Discipline | Other |
| Published In | Volume 4, Issue 3, May-June 2026 |
| Published On | 2026-05-17 |

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