Advanced International Journal of Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2584-0487   Impact Factor: 9.11

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लोककथाएँ और सामाजिक चेतना: परंपरा से आधुनिकता तक का विश्लेषण

Author(s) Prof. Dr. Karishma M. Kambe
Country India
Abstract लोककथाएँ किसी भी समाज की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक अनुभव, नैतिक मान्यताओं और जीवन-दृष्टि की जीवित अभिव्यक्ति होती हैं। वे केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज की चेतना को निर्मित करने वाली महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संरचनाएँ हैं। लोककथाओं में जनजीवन, संघर्ष, नैतिकता, आस्था, संबंध, श्रम, सत्ता, प्रतिरोध, न्याय और सामाजिक आदर्शों का ऐसा रूप मिलता है, जो लिखित इतिहास या औपचारिक साहित्य में प्रायः नहीं मिलता। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य लोककथाओं की सामाजिक भूमिका का विश्लेषण करना है, विशेष रूप से इस दृष्टि से कि वे परंपरागत समाज में किस प्रकार सामाजिक चेतना का निर्माण करती थीं और आधुनिकता के दौर में उनकी भूमिका किस रूप में परिवर्तित हुई है। इस अध्ययन में लोककथाओं को केवल साहित्यिक पाठ न मानकर सामाजिक दस्तावेज के रूप में देखा गया है। शोध में यह प्रतिपादित किया गया है कि लोककथाएँ समाज को नैतिक दिशा देने, सामुदायिक पहचान स्थापित करने, पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखने और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना विकसित करने में महत्त्वपूर्ण रही हैं। आधुनिकता, शिक्षा, नगरीकरण, तकनीक, जनसंचार माध्यम और डिजिटल संस्कृति के प्रभाव से लोककथाओं का रूप बदला है, परंतु उनका महत्व समाप्त नहीं हुआ। आज भी वे नई व्याख्याओं, नए माध्यमों और नए सामाजिक संदर्भों में जीवित हैं। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि लोककथाएँ परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु का कार्य करती हैं तथा सामाजिक चेतना के विकास में उनका योगदान आज भी प्रासंगिक है।
Keywords लोककथा, सामाजिक चेतना, परंपरा, आधुनिकता, लोकसंस्कृति, नैतिकता, सामूहिक स्मृति
Discipline Other
Published In Volume 4, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-08-10
DOI https://doi.org/10.62127/aijmr.2026.v04i04.1460

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