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Volume 4 Issue 5
September-October 2026
| Author(s) | विकास सिंह, डॉ. वन्दना शर्मा |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | नारायण दाश समकालीन संस्कृत लघुकथा साहित्याकाश में नवोन्मेषिनी प्रतिभा संपन्न एक उदीयमान नक्षत्र है। उनका पहला कथासंग्रह गङ्गे! च यमुने चैव शीर्षक से प्रकाशित है जिसके नवीन कथाशिल्प को समकालिक साहित्य जगत् में प्रशस्य स्थान प्राप्त है। इस संग्रह में भाव और कला पक्ष दोनों में समान रूप से आधुनिकता द्योतित है। उनकी कथाओं में समकालीन मानव समाज के आदर्श एवं यथार्थ कल्पना एवं सत्य भाव एवं बुद्धिपरक विसंगतियों को विचारात्मक पृष्ठभूमि में अभिव्यक्त किया गया है। इस संग्रह का नाम करण 7वीं कथा के आधार पर किया गया है। इस कथा का शीर्षक या कथा संग्रह का शीर्षक एक प्रसिद्ध श्लोकांश है जो हर भारतीय का हर पुण्य कार्य का संकल्प में पहले उच्चारित होता है। पुरा श्लोक है- गङ्गे! च यमुने! चैव गोदावरि! सरस्वति! नर्मदे! सिन्धु! कावेरि! जलेऽस्मिन् सन्निधि भव ॥ सचमुच यहां उदात्त महाभारतीय भावना का झलक दिख रहा है। क्योंकि जब कोई भी भारतीय भले ही वह अपने गांव का तलाव में नहा रहा है, परन्तु वह मन ही मन भारत के सभी नद नदियों का आवाहन करता है। देश की मिट्टी को, जल को, पत्थर को वह अपने मनन के मन्त्र से देव वना देता है। प्रस्तुत कथा-संग्रह में वर्तमान समय की अनेक समस्याओं का सटीक भावात्मक क्रिया-प्रतिक्रियापरक रूपायन किया गया है। जातिप्रथा, दहेजप्रथा, भ्रष्टाचार, दादागिरी, दरिद्रता, विज्ञान-भयावहता, छल-कपट, बलात्कार, अत्याचार, हनन आदि अनेकानेक सामाजिक समस्याओं को लेखक ने भावपूर्ण स्वर प्रदान किया है। कथा गङ्गे च यमुने चैव में उच्च भावों का उद्बोधन है, देश, समाज और धर्म के प्रति लाभदायक दृष्टि है, मानव चरित्र को उन्नत करने योग्य सामग्री है। भारतीय मूल का नायक स्वदेश की उदात्त भावनाओं से अभिप्रेरित होकर जीवन के अन्तिम चरण में भारत वापस आकर समाप्तप्राय अपने सपनों की आदर्श एवं पावन भारतीय संस्कृति का अन्वेषण करता है। किन्तु क्रम वर्धमान वैदेशिक संस्कृति तथा अतीत की मधुर स्मृतियों की धूल-धूसरता से अत्यन्त अभिशप्त होता है। अन्ततः भागीरथी के तट पर परमात्मा के प्रीत्यर्थ जीवन-निर्वाह का लक्ष्य लेने वाले प्रातः स्नान परायण भक्तों की आध्यात्मिक स्वर-लहरियों से आह्लादित होता है। प्रवृत्ति के पश्चात् निवृत्ति का क्रम आता है। इसी क्रम में लेखक परिवार, भोग और मोह में आसक्त जीवन में प्रवृत्त रहते हुए अन्त में निवृत्ति-मार्ग का अनुसरण कर, सब त्यागकर स्वदेश प्रस्थान करता है। बाल्यकाल की मधुर स्मृतियाँ तथा संस्कार मृत्युपर्यन्त व्यक्ति के अवचेतन में समाविष्ट रहते हुए अभिप्रेरित करते हैं। समय की परिवर्तनशील धारा के परिणामस्वरूप लेखक देखता है कि यहाँ गाँव की गलियाँ नहीं, घर का टूटा आंगन नहीं, सखा-सहोदर नहीं, जीवन की सरलता नहीं, आनन्द नहीं, यहाँ तो न्यायालय-आरक्षी है, चिन्ता, प्राणहीनता और उदासीनता है। शिक्षालयों में वृद्ध शिक्षक अंग्रेजी सीखा रहे हैं। आतिथ्यभाव का अभाव है। लेखक को रात्रियापनार्थ कहीं कोई स्थान उपलब्ध नहीं हो पाता। वाल्मीकि: कथा में जातिप्रथा तथा पारिवारिक मूल्यों के मध्य व्यक्तिगत तथा सामाजिक संघर्ष झेलते प्रेमियों का मार्मिक चित्रण है। कथा का आरम्भ वातावरणीय वर्णन से हुआ है। वर्षा या मेघ सदा से ही साहित्य में भावोद्दीपक के रूप में प्रयुक्त होते रहे हैं। यहाँ भी वर्षा की आर्द्रता से संवेदनशील अलका के अन्तःस्थल में अनेक भावधाराएँ आलोडित होती हुई अतीत की स्मृतियों को मानस पटल पर उद्भावित करती हैं। संस्कृत-साहित्य अपनी शृंगारिकता के लिए प्रसिद्ध रहा है। प्रेममय से मेघदूत का अध्ययन करते समय ही चिकित्सिका अलका के हृदय में प्रथमतः प्रेम-बेल अंकुरित होती है। यद्यपि प्रेममय के विचार से यह प्रेम-बेल कुमारसम्भवम् के संयोग-शृंगार वर्णन के अध्ययनकाल में अंकुरित हुई थी। किन्तु संयोग की अपेक्षा वियोग का प्रभाव अधिक स्थायी होता है, अपनी भाव-कल्पना में अलका प्रेममय को अभिशप्त यक्ष तथा स्वयं को उसी की विरहिणी प्रिया स्वीकारती है। प्रेममय अपना वास्तविक परिचय छिपाते हुए विश्वासघात करता है। जब अलका को प्रेममय के हरिजन होने का ज्ञान होता है, तब वह प्रेममय के विश्वासघात से विचलित नहीं होती हुई अपनी आदर्शमयी भावनाओं के प्रति पूर्ण समर्पण को प्रमाणित करती और समस्त पारिवारिक, सामाजिक विरोध, बाधाओं को तोड़ती हुई उससे विवाह करती है। |
| Keywords | . |
| Discipline | Arts |
| Published In | Volume 4, Issue 5, September-October 2026 |
| Published On | 2026-09-22 |

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